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अटलांटा का दूसरा हिन्दी दिवस समारोह
अनुभूति काबरा

“हिन्दी दिवस“ प्रत्येक वर्ष १४ सितंबर को मनाया जाता है। १४ सितंबर १९४९ के दिन संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में ,14 सितंबर को  हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।



वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने इसे जनमानस की भाषा कहा था और इसे देश की राष्ट्रभाषा भी बनाने को कहा था हिन्दी को राजभाषा बनाने मे गाँधीजी की भूमिका भी अहम रही।  महात्मा गाँधी गुजरात से थे  लेकिन उन्होने राष्ट्र को जोड़ने के लिए हिन्दी के महत्व को समझा और अपने आंदोलन की भाषा के लिए हिन्दी को चुना।
लेकिन आजादी के बाद ऐसा कुछ नहीं हो सका।आज भी हिन्दी को  राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्राप्त नहीं हो सका है।”


 
अटलांटा स्थित भारतीय महावाणिज्यदूतावास (कौंसलावास) ने धूप छाँव नाट्य समूह के साथ से १५ सितंबर को ,अटलांटा स्थित “सरदार पटेल भवन” में दूसरे हिन्दी दिवस के कार्यक्रम का आयोजन किया।
“धूप छाँव “अटलांटा का एक दशक पुराना हिन्दी नाट्यसमूह है जो संस्थापिका संध्या सक्सेना भगत बहुत उत्साह से चलाती हैं।  पिछ्ले वर्ष से  कौंसलावास ने हिन्दी दिवस का आयोजन करना प्रारंभ किया है जो बहुत सराहनीय है। जिसके आयोजन में अटलांटा का धूप छाँव हिन्दी नाट्य समूह अपना पूरा सहयोग देता है।२०१६ में यह दिवस हिन्दी कविता पाठ करके  मनाया गया जिसमें लोगों ने स्वरचित रचनाओँ का पाठ किया। नन्हे प्रतिभागियों ने भी  इसमे हिस्सा लिया। इस प्रकार का आयोजन हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए एक  बहुत अच्छी शुरुआत रही।
२०१७ में हिन्दी दिवस  और भी बड़े स्तर पर मनाया गया। इसमें रंगारंग कार्यक्रमों का समावेश तो था ही, साथ में कौंसलावास की ओर से रात्रि भोज का भी ,आयोजन था। 



कार्यक्रम के मुख्य अतिथि  श्री डी वी सिंह जी थे, जिन्होने कार्यक्रम का उद्‍घाटन किया। शुभारंभ बिकाश कुमार(कौंसलावास) ने अपनी हिन्दी कविता 'हिन्दी वर्णमाला रिश्तों की जान' से किया। आकांक्षा राजपाल व निधि पीपल कार्यक्रम की निपुण संचलिकाएं थीं। जहाँ डा. मृदुल कीर्ति  जी ने हिन्दी भाषा पर अपने भाषण से लोगों को हिन्दी की बारीकियों से अवगत करवाया ,वहीं शैलेश लखटकिया जी ने हिन्दी की एक रोचक लघु कथा सुनाई।



तदुपरांत आई नन्हे कलाकारों की बारी।  सात वर्षीया आन्या राठी और आठ वर्षीय धीरज लूनावत ने आसाम का बीहू नृत्य प्रस्तुत किया। असमिया परिधान में सज्जित नन्हे नर्तकों की दर्शकों ने भूरि-भूरि सराहना की।  सात वर्षीया लावण्या भाटिया ने 'एक बच्चे की व्यथा' इतने मनोरंजक ढंग से सुनाई की दर्शक हँसी से लोट पोट हो गये। विदेश में रहकर अपनी भाषा को सहेज कर रखना सभी के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। इस प्रकार के आयोजन, जहाँ छोटे छोटे प्रतिभागियों को मंच पर अपनी कला दिखाने का अवसर मिलता है, उनके लिए प्रेरणा का स्रोत होते हैं और इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण भी। कार्यक्रम की अगली प्रस्तुति थी हिन्दी फिल्मी गीत पर समूह नृत्य, जिसे प्रस्तुत किया चरित्रा जुलापल्ली, पृशा जैन, रैना जैन और अयाना विज ने। यहाँ गौर करने की बात यह है की हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार में हिन्दी फिल्म उद्योग का बड़ा हाथ रहा है। किसी भी भाषा की लोकप्रियता उसकी लोक संस्कृति से जुड़ी होती है। जिस भाषा में भी लोग अपने विचार व्यक्त करना, बातचीत करना, पढ़ना और मनोरंजन के साधन ढूँढना पसंद करते हैं, वही भाषा पुष्पित और पल्लवित होती है।  हिन्दी चलचित्र केवल भारत देश में ही नहीं, विदेशों में भी लोकप्रिय हैं।  और अगर यह कहें की हिन्दी भाषा को सॅंजो कर रखने में हिन्दी फिल्मों और टी वी पर हिन्दी धारावाहिकों का भी बड़ा हाथ है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। 

 
जहाँ एक ओर लोग हिन्दी फिल्में देखना पसंद करते हैं, वहीं दूसरी ओर मध्यम या उच्‍च वर्ग के लोग आपस मे अँग्रेज़ी मे बातचीत करने में अपनी शान समझते हैं। कुछ इसी तरह की मानसिकता को दिखाने के लिए संध्या भगत और हफ़ीज़ सईद लेकर आए एक व्यंग्यात्मक कार्यक्रम - "चाय पर चर्चा". संध्या भगत ने एक टीवी टॉक शो होस्ट की भूमिका निभाई और हफ़ीज़ ने एक बॉलीवुड सितारे की।  मज़े की बात यह थी कि यह सितारा जनता को हिन्दी भाषा का उपयोग करने की प्रेरणा देना चाहता है और वह देता भी है.......परंतु सब अँग्रेज़ी  भाषा में! वह हिन्दी बोलने में पूरी तरह असमर्थ होता है। यही आज के समय की विडंबना है कि भारत की  मुख्य भाषा  अँग्रेज़ी के सामने गौण हो गयी है।  इसे लिखा व निर्देशित भी किया संध्या सकसेना भगत ने।


कार्यक्रम को आगे बढ़ाया तराना मलिक और ईशा जैन के बॉलीवुड नृत्य ने। ऊर्जा से भरे इस नृत्य ने दर्शकों का मनोरंजन किया। इसके बाद सभी दर्शकों को प्रतीक्षा थी हिन्दी नाटक 'बाप रे बाप' की. इसकी तैयारी के लिए जब पर्दा बंद हुआ तो आलोक शर्मा ने अपनी स्वरचित कविता 'सन्नाटे सा शोर' से द सुनाकर दर्शकों को बाँध सा लिया।


 फिर आई नाटक की बारी. १ घंटे के इस नाटक का विषय बड़ा मनोरंजक था। एक मध्यम वर्गीय परिवार की कहानी है। जिसमें घर के मालिक के पिता घर से लापता हो जाते हैं। बूढ़े पिता पर 'भागने' का लांछन लगता है। उन्हे ढूँढने के लिए तरह तरह के प्रयोजन किए जाते हैं और ढूँढ लाने वाले के लिए अच्छा ख़ासा ईनाम भी रखा जाता है। ईनाम पाने के लिए लोग नकली पिता लेकर आते हैं और उस से जो हास्यास्पद स्थितियाँ पैदा होती हैं, उसने दर्शकों को बहुत हँसाया।  नाटक के पात्रों ने अपना अपना किरदार बहुत ही अच्छे से निभाया और दर्शकों को अंत तक बाँधे रखा। नाटक के मूल रचनाकार थे के पी सक्सेना। रूपांतरण और निर्देशन किया संध्या सक्सेना भगत ने। इस  नाटक में हिस्सा लेने वाले कलाकार थे- विजय टंडन, मोहम्मद शोहेब, श्री वोरा, सरफ़राज़ ख़ान, मोईज़ हुसैन, सतीश धर्मराजन, शोभा शिवराम और निधि मिश्रा वाजपाई। संगीत दिया अनिल कंवल भगत और आलोक शर्मा ने। मंच सज्जा अभिनव डेहरिया और एकता निरूला जैन ने बखूबी निभाई। पुनीत भटनागर व एकता निरुला (धूपछाँव के फोटोग्राफरों ने भी हर मौके पर तस्वीर लेकर अपनी भूमिका बखूभी निभाई।



कार्यक्रम समापन की ओर बढ़ा। बिकाश कुमार ने एक बार फिर माईक संभाला सबसे पहले अंजली छाबड़िया (टी.वी.एशिया) व वासु पटेल (सरदार पटेल भवन) का आभार प्रकट किया और एक बार  श्री डी वी सिंह और संध्या भगत को मंच पर आमंत्रित किया. श्री डी वी सिंह ने प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र और ट्रॉफी देकर उनका उत्साह वर्धन किया। भीनी भीनी यादों के साथ और अगले वर्ष पुनः मिलने के आश्वासन के साथ  अटलांटा का २०१७ का हिन्दी दिवस समारोह संपन्न हुआ इस विचार के साथ हुआ कि हम सिर्फ हिन्दी भाषा को एक दिवस तक सीमित नहीं रखेंगे बल्कि अपनी जगह दिलाने की मशाल हमेशा जलाए रखेंगे। 



बहुत-बहुत आभार ‘ अटलांटा दुनिया’  व ‘राष्ट्रीय दर्पण”  पत्रिकाओँ के संपादकों  कैलाश खंडेलवाल व रवि दवे जी का, जिन्होंने हमारे इस हिन्दी में लिखे गए लेख को ,अपनी पत्रिकाओँ में स्थान दिया।


संपर्क;
Dhoop.Chaoon@gmail.com


 





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